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Landslide

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में शुक्रवार को एक विशाल भूस्खलन का वीडियो सामने आया है. प्रकृति के रौद्र रूप का यह वीडियो सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म्‍स पर वायरल भी हो रहा है.


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न्‍यूज एजेंसी ANI द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे एक पर्वत का बड़ा हिस्‍सा महज कुछ सेकेंड्स में ही धराशायी हो गया है. इस भूस्‍खलन में सड़क का एक हिस्‍सा भी मिट्टी की ढेर में तब्‍दील होते दिखाई दे रहा है. पहाड़ी इलाकों में हर साल भूस्‍खलन के वीडियो सामने आते रहते हैं.


भूस्‍खलन एक भूवैज्ञानिक घटना है और इसके पीछे कई कारण होते हैं – जैसे पेड़ों और अन्‍य वनस्पतियों के हटाने, सड़क किनारे खड़ी चट्टान को काटने, भारी बारिश या पानी के पाइपों में रिसाव की वजह से भी भूस्‍खलन हो सकता है. इसमें हर साल भारी नुकसान होता है. इसके कई प्रकार भी होते हैं. ऐसे में अगर भूस्‍खलन से पहले ही अगर अलर्ट मिल जाए तो बहुत हद तक संभावी नुकसान को बजाया जा सकता है.


आईआईटी मंडी ने तैयार की खास डिवाइस

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान, मंडी के दो प्रोफेसर डॉ वरुण दत्त और डॉ के वी उदय ने 2017 में मंडी के ही कोटरोपी में ऐसे ही भूस्‍खलन के बाद एक खास डिवाइस को तैयार किया है, जो इस तरह की किसी घटना से पहले ही चेतावनी दे देता है. द बेटर इंडिया ने अपनी एक‍ रिपोर्ट में दोनों के हवाले से लिखा, ‘भूस्‍खलन के लिए मौजूदा समय में कई डिवाइस हैं, जिसकी मदद से इसका अनुमान लगाया जा सकता है. हम कुछ ऐसा तैयार करना चाहते थे, जो पूरी तरह से भारत में बना हो, कम खर्चीला हो और आसानी से पहाड़ी इलाकों पर इसे इंस्‍टॉल किया जा सके.’


हिमाचल प्रदेश में 13 जगहों पर इस डिवाइस को लगाया गया है. आईआईटी मंडी ने इस जिले के जिला प्रशासन से एक समझौत भी किया, जिसमें उन्‍होंने आगे चलकर 20 डिवाइसेज को भी लगाया है.


कैसे काम करती है ये डिवाइस 


इस डिवाइस को तैयार करने के लिए इन दोनों प्रोफेसरों ने स्‍टाफ और स्‍टूडेंट्स के साथ मिलकर 7 लोगों की एक टीम बनाई थी. इस टीम ने भूस्‍खलन के लिए कारक स्‍लोप से लेकर अन्‍य जरूरी पैरामीटर्स पर रिसर्च किया, उन्‍हें मॉनिटर किया. उन्‍होंने मौजूदा तकनीक को भी समझा. इससे जुटाए गए आंकड़ों को समझने के बाद इस टीम ने ‘माइक्रो-इलेक्‍ट्रो-मैकेनिकल-सिस्‍टम’ (MEMS) को तैयार किया. इसमें एक्‍सेलेरोमीटर का भी इस्‍तेमाल किया गया ताकि छोटी से छोटी हरकत का भी पता लगाया जा सके. इस डिवाइस में इंटरनेट ऑफ थिंग्‍स का भी इस्‍तेमाल (IoT) का भी इस्‍तेमाल किया गया. यह एक ऐसा सिस्‍टम है, जिसकी मदद से क्‍लाउड के जरिए डेटा को भेजा या रिसीव किया जाता है.


डिवाइस ने भारी नुकसान से बचने में मदद की

इस डिवाइस को तैयार करने के बाद टीम ने कृत्रिम रूप से तैयार की गई परिस्थिति में टेस्टिंग भी की. इसकी सफलता के बाद एक प्रोटोटाइप को कैम्‍पस के नजदीक ही एक भूस्‍खलन के संभावी क्षेत्र में भी लगाया गया. अगस्‍त 2018 में ही दोनों प्रोफसरों ने एक Intiot Services नाम से एक स्‍टार्टअप भी लॉन्‍च किया. इसी महीने इन्‍होंने ने घरपा पहाड़ी पर पहला कॉमर्शियल डिवाइस लगाया. इसके बाद अगले कई सालों में जिला प्रशासन के साथ मिलकर कई जगहों पर इस डिवाइस को लगाया गया. मंडी-जोगिंदर नगर नेशनल हाईवे पर लगाए गए ऐसे ही एक डिवाइस ने भारी बार‍िश के बाद म‍िट्टी के मूवमेंट का पता लगाने के बाद चेतावनी जारी किया.


इस चेतावनी के बाद पुलिस ने समय रहते ही सफलतापूर्वक ट्रैफिक हटाया और अन्‍य तरह की तैयारियां की गईं, ताकि नुकसान को कम किया जा सके. सेंसर्स और अलर्ट करने वाली प्रणाली के साथ इस डिवाइस पर 1 लाख रुपये का खर्च पड़ता है. पहले से मौजूदा डिवाइसेज व सिस्‍टम्‍स की तुलना में यह 200 गुना सस्‍ता है.



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